ये प्रतिक्रियाएं/समीक्षाएं साहित्य या पत्रकारिता के किसी पारंपरिक ढांचे के अनुसार नहीं होंगीं। जिस फ़िल्म पर जितना और जैसा कहना ज़रुरी लगेगा, कह दिया जाएगा । (आप कुछ कहना चाहें तो आपका स्वागत है।)

Monday, 10 April 2017

जॉली एलएलबी 2

इस फ़िल्म के बारे में आवश्यक जानकारियां आप इन दो लिंक्स् पर क्लिक करके देख सकते हैं -  





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हो सकता है यह सिर्फ़ संयोग हो कि इस फ़िल्म के अंत में अक्षय कुमार द्वारा बोले गए संवाद के निहितार्थ, बहुत पहले फ़ेसबुक पर लिखे मेरे एक स्टेटस से मिलते-जुलते हैं। लेकिन फिर भी मैं कहूंगा कि इस तरह की घटनाओं पर नज़र रखें और देखें कि कौन-सी बात पहले कहां कही गई है। सोशल मीडिया से लेकर इलैक्ट्रॉनिक मीडिया तक पर ऐसे महापुरुषों की कोई कमी नहीं है जो साहित्यिक/वैचारिक चोरी में कोई बुराई नहीं मानते।

सोशल मीडिया के प्रसार से पहले तक हमारे विद्वान-पत्रकार-साहित्यकार आदि उन्हीं लेखों को अच्छा लेख मानते रहे हैं जिनमें लेखक के अपने विचार कम और दूसरे/पुराने लोगों/क़िताबों के विचार ज़्यादा हों।  ओह माई गॉड, पीके, पीकू जैसी, अनछुए, कमछुए विषयों पर नये या अलग ट्रीटमेंट या प्रस्तुतिकरण के साथ आई फ़िल्में इंटरनेट के प्रसार के बाद बनी हैं, इस अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य को भूलने की ग़लती हरग़िज़ न करें।

(आगे और भी)

-संजय ग्रोवर

10-04-2017

Thursday, 12 January 2017

ओम पुरी और निराकार

कल जब उठा तो इंटरनेट से पता लगा कि ओम पुरी नहीं रहे। काफ़ी टाइम बाद टीवी लगाया। उससे पहले देखा कि फ़ेसबुक आदि पर श्रद्धांजलियों की मात्रा और रफ़्तार बहुत कम है। मैं सोचने लगा कि इसकी वजह क्या हो सकती है ? मेरी तो ‘श्रद्धांजलियों’ में दिलचस्पी ही कम रही है लेकिन दूसरे बहुत-सारे लोग हैं जिनका आधा दिन श्रद्धांजलियों और बधाईयों में ग़ुज़रता है। एक महिला-मित्र ने तो दोस्ती के दूसरे-तीसरे दिन ही एक बड़े आदमी को श्रद्धांजलि देने की आज्ञा जारी कर दी। मैंने इंकार कर दिया।

ओम पुरी जब आए तो न टीवी था, न सीरियल थे, न रीएलिटी शो थे ; नाम और पैसे, दोनों के लिए बस एक ही जगह थी-बंबईया फ़िल्में। उसमें से भी उन्हें मिली कथित कला फ़िल्में या कथित समानांतर फ़िल्में। इन फ़िल्मों की हालत ऐसी थी कि एक बार मैं शशि कपूर द्वारा निर्मित ‘जुनून’ देखने अकेला ही घर से निकल गया और बालकनी की ईवनिंग शो की टिकट भी ख़रीद ली मगर जब ऊपर पहुंचा तो देखा कि हॉल सांय-सांय कर रहा है। मैं घबरा गया, क्योंकि टिकट भी बेचना चाहें तो बेचेंगे किसको, कोई ख़रीदनेवाला तो हो। लोग तो बस धर्मेंद्र, जीतेंद्र, अमिताभ को जानते थे, नसीर और ओम का तो नाम ही सुनके परेशान हो जाते थे। फिर मैंने यही निर्णय लिया कि पांच रुपए का टिकट लेके घर ही चले जाएंगे, अकेले देखना तो मेरे बस का है नहीं। सही बात तो यह थी कि कला फ़िल्में पूरी तरह मुझे भी समझ में नहीं आतीं थीं और कहीं-कहीं डरावनी भी लगतीं थीं लेकिन आत्मविश्वास पूरा आया नहीं था ऊपर से बुद्धिजीवी और अलग दिखने के चक्कर में भी चुप्पी धारण कर लेता था। फिर एक आदमी जो थोड़ा-थोड़ा जान-पहचान का था, टिकट ख़रीदता दिखाई दिया, पूछने पर पता लगा कि बालकनी का ही टिकट ख़रीद रहा है तो ज़रा जान में जान आई। बाद में पांच-दस लोग और भी आ गए।

‘अर्द्धसत्य’ इसलिए भी हिट हुई कि उसका अंत कमर्शियल फ़िल्मों जैसा था और यथार्थ से उलट था। ओम पुरी की अपनी मौत ‘अर्द्धसत्य’ से बिलकुल उलट है। सफ़ल और बड़े आदमी होते हुए भी मौत के समय, जैसा कि चैनल आदि बता रहे हैं, वे अकेले थे। दिलचस्प बात यह है कि आलोचक-समीक्षक-बुद्धिजीवी उन फ़िल्मों को ‘मुख्यधारा की फ़िल्में’ बताते रहे जिनमें यथार्थ बहुत कम था या उल्टा-पुल्टा करके दिखाया जाता रहा। इलैक्ट्रॉनिक मीडिया ने शाम को बताया कि ओम पुरी का पोस्टमॉर्टम भी हुआ था। जिस दुनिया के लोग ‘नारीमुक्ति’, ‘ईमानदारी’, ‘सच्चाई’ और ‘ऐडजस्ट न करने’ के नाम पर भी अपना-अपना सामान बेचने में लगे हैं ठीक उसी दुनिया में रहते हुए ओम पुरी हक़ीकत को कितना बारीक़ी से समझते थे, दूर से कहना मुश्क़िल है।

ओम पुरी के उन पलों के बारे में बहुत से लोग जानते हैं जब वे एक स्टेज पर ईमानदारी की बातें करने पहुंच गए थे। उन्होंने इसे सीरियसली लिया होगा। वे वहां कुछ पांच-दस मिनट बोले होंगे। आंदोलन के बाक़ी सब लोग चुस्त-दुरुस्त ही होंगे, कहते हैं ओम पुरी अब नहीं रहे।


(जारी)

06-01-2017