ये प्रतिक्रियाएं/समीक्षाएं साहित्य या पत्रकारिता के किसी पारंपरिक ढांचे के अनुसार नहीं होंगीं। जिस फ़िल्म पर जितना और जैसा कहना ज़रुरी लगेगा, कह दिया जाएगा । (आप कुछ कहना चाहें तो आपका स्वागत है।)

Monday, 8 May 2017

बाहुबलि : समय, पैसे और बुद्धि की बलि

हमारे यहां ‘पराग’ और ‘चंपक’ जैसी बाल पत्रिकाएं आतीं थीं। कभी-कभार ‘लोटपोट’, ‘दीवाना’ वगैरह कहीं से मिल जाएं तो पढ़ लेते थे। ज़्यादातर दूसरे बच्चे ‘नंदन’ और ‘चंदामामा’ पढ़ते थे। ये दोनों ख़ूब बिकतीं थीं। मगर मैं नहीं पढ़ पाता था क्योंकि इनमें अकसर सभी कहानियां राजा-रानियों या भूत-प्रेतों की होती थीं।

बाहुबलि’ देखी तो लगा कि वहीं ‘चंदामामा’ और ‘नंदन’ के ज़माने में पहुंच गया हूं। इंटरवल के थोड़ी देर बाद तक जैसे-तैसी देखी फिर छोड़कर अपने काम में लग गया।

-संजय ग्रोवर
08-05-2017

Monday, 10 April 2017

जॉली एलएलबी 2

इस फ़िल्म के बारे में आवश्यक जानकारियां आप इन दो लिंक्स् पर क्लिक करके देख सकते हैं -  





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हो सकता है यह सिर्फ़ संयोग हो कि इस फ़िल्म के अंत में अक्षय कुमार द्वारा बोले गए संवाद के निहितार्थ, बहुत पहले फ़ेसबुक पर लिखे मेरे एक स्टेटस से मिलते-जुलते हैं। लेकिन फिर भी मैं कहूंगा कि इस तरह की घटनाओं पर नज़र रखें और देखें कि कौन-सी बात पहले कहां कही गई है। सोशल मीडिया से लेकर इलैक्ट्रॉनिक मीडिया तक पर ऐसे महापुरुषों की कोई कमी नहीं है जो साहित्यिक/वैचारिक चोरी में कोई बुराई नहीं मानते।

सोशल मीडिया के प्रसार से पहले तक हमारे विद्वान-पत्रकार-साहित्यकार आदि उन्हीं लेखों को अच्छा लेख मानते रहे हैं जिनमें लेखक के अपने विचार कम और दूसरे/पुराने लोगों/क़िताबों के विचार ज़्यादा हों।  ओह माई गॉड, पीके, पीकू जैसी, अनछुए, कमछुए विषयों पर नये या अलग ट्रीटमेंट या प्रस्तुतिकरण के साथ आई फ़िल्में इंटरनेट के प्रसार के बाद बनी हैं, इस अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य को भूलने की ग़लती हरग़िज़ न करें।

(आगे और भी)

-संजय ग्रोवर

10-04-2017