ये प्रतिक्रियाएं/समीक्षाएं साहित्य या पत्रकारिता के किसी पारंपरिक ढांचे के अनुसार नहीं होंगीं। जिस फ़िल्म पर जितना और जैसा कहना ज़रुरी लगेगा, कह दिया जाएगा । (आप कुछ कहना चाहें तो आपका स्वागत है।)

Thursday, 12 January 2017

ओम पुरी और निराकार

कल जब उठा तो इंटरनेट से पता लगा कि ओम पुरी नहीं रहे। काफ़ी टाइम बाद टीवी लगाया। उससे पहले देखा कि फ़ेसबुक आदि पर श्रद्धांजलियों की मात्रा और रफ़्तार बहुत कम है। मैं सोचने लगा कि इसकी वजह क्या हो सकती है ? मेरी तो ‘श्रद्धांजलियों’ में दिलचस्पी ही कम रही है लेकिन दूसरे बहुत-सारे लोग हैं जिनका आधा दिन श्रद्धांजलियों और बधाईयों में ग़ुज़रता है। एक महिला-मित्र ने तो दोस्ती के दूसरे-तीसरे दिन ही एक बड़े आदमी को श्रद्धांजलि देने की आज्ञा जारी कर दी। मैंने इंकार कर दिया।

ओम पुरी जब आए तो न टीवी था, न सीरियल थे, न रीएलिटी शो थे ; नाम और पैसे, दोनों के लिए बस एक ही जगह थी-बंबईया फ़िल्में। उसमें से भी उन्हें मिली कथित कला फ़िल्में या कथित समानांतर फ़िल्में। इन फ़िल्मों की हालत ऐसी थी कि एक बार मैं शशि कपूर द्वारा निर्मित ‘जुनून’ देखने अकेला ही घर से निकल गया और बालकनी की ईवनिंग शो की टिकट भी ख़रीद ली मगर जब ऊपर पहुंचा तो देखा कि हॉल सांय-सांय कर रहा है। मैं घबरा गया, क्योंकि टिकट भी बेचना चाहें तो बेचेंगे किसको, कोई ख़रीदनेवाला तो हो। लोग तो बस धर्मेंद्र, जीतेंद्र, अमिताभ को जानते थे, नसीर और ओम का तो नाम ही सुनके परेशान हो जाते थे। फिर मैंने यही निर्णय लिया कि पांच रुपए का टिकट लेके घर ही चले जाएंगे, अकेले देखना तो मेरे बस का है नहीं। सही बात तो यह थी कि कला फ़िल्में पूरी तरह मुझे भी समझ में नहीं आतीं थीं और कहीं-कहीं डरावनी भी लगतीं थीं लेकिन आत्मविश्वास पूरा आया नहीं था ऊपर से बुद्धिजीवी और अलग दिखने के चक्कर में भी चुप्पी धारण कर लेता था। फिर एक आदमी जो थोड़ा-थोड़ा जान-पहचान का था, टिकट ख़रीदता दिखाई दिया, पूछने पर पता लगा कि बालकनी का ही टिकट ख़रीद रहा है तो ज़रा जान में जान आई। बाद में पांच-दस लोग और भी आ गए।

‘अर्द्धसत्य’ इसलिए भी हिट हुई कि उसका अंत कमर्शियल फ़िल्मों जैसा था और यथार्थ से उलट था। ओम पुरी की अपनी मौत ‘अर्द्धसत्य’ से बिलकुल उलट है। सफ़ल और बड़े आदमी होते हुए भी मौत के समय, जैसा कि चैनल आदि बता रहे हैं, वे अकेले थे। दिलचस्प बात यह है कि आलोचक-समीक्षक-बुद्धिजीवी उन फ़िल्मों को ‘मुख्यधारा की फ़िल्में’ बताते रहे जिनमें यथार्थ बहुत कम था या उल्टा-पुल्टा करके दिखाया जाता रहा। इलैक्ट्रॉनिक मीडिया ने शाम को बताया कि ओम पुरी का पोस्टमॉर्टम भी हुआ था। जिस दुनिया के लोग ‘नारीमुक्ति’, ‘ईमानदारी’, ‘सच्चाई’ और ‘ऐडजस्ट न करने’ के नाम पर भी अपना-अपना सामान बेचने में लगे हैं ठीक उसी दुनिया में रहते हुए ओम पुरी हक़ीकत को कितना बारीक़ी से समझते थे, दूर से कहना मुश्क़िल है।

ओम पुरी के उन पलों के बारे में बहुत से लोग जानते हैं जब वे एक स्टेज पर ईमानदारी की बातें करने पहुंच गए थे। उन्होंने इसे सीरियसली लिया होगा। वे वहां कुछ पांच-दस मिनट बोले होंगे। आंदोलन के बाक़ी सब लोग चुस्त-दुरुस्त ही होंगे, कहते हैं ओम पुरी अब नहीं रहे।


(जारी)

06-01-2017


Monday, 26 December 2016

दंगल: बच्चों के लिए घातक बापू (यानि माता-पिता एंड कंपनी)

शायद बारहवीं में पढ़ता होऊंगा, एक दोस्त से किसी फ़िल्म की कुछ बुराई कर दी तो बोला कि उनके करोड़ो रुपए लग जाते हैं और तुम तो मुंह उठाके किसीकी भी बुराई कर देते हो! मैंने कहा युद्ध में भी ख़रबों रुपए लग जाते हैं तो क्या सिर्फ़ इसी वजह से मैं मार-काट की तारीफ़ करने लगूं! बहरहाल, वह दोस्त न तो घोषित विद्वान था न कोई बड़ा, पैसे या नामवाला आदमी था मगर यहां तो देखता हूं कि प्रगतिशीलता और समानता के पक्षधर, ग़रीब जनता की हमदर्द विचारधाराओं के आला सिपाही, बड़े लोगों/नामों को महान ठहराने के लिए विचित्र से विचित्र बहाने और पवित्र से पवित्र भाषा खोज लाते हैं। ये महान लोग इतना भी नहीं समझते कि फ़ोटोग्राफ़ी, कोरियोग्राफ़ी, ड्रेस-डिज़ाइनिंग आदि की समझ भले ही सबको न होती हो मगर फ़िल्म में एक कहानी होती है जिसको कहने का सबका अपना-अपना ढंग होता है और जिसका लोगों पर तरह-तरह का असर होता है। उसे आज भी कई लोग पैसे ख़र्च करके देखते हैं। कुछ अजीब लगता है तो उन्हें उसे बताने का पूरा हक़ है।

यह फ़िल्म शुरु में ही झटका देती है जब आमिर खान कहते हैं कि जो काम मैं नहीं कर पाया, अपने बेटे से करवाऊंगा। भारतीय बापों(एंड कंपनी) की इसी मानसिकता ने कई बच्चों को अवसाद और मानसिक रुग्णता में डाले रखा है। आगे आमिर यह ज़बरदस्ती अपनी लड़कियों से कर डालते हैं। छोटी बच्चियों को सुबह-सुबह उठाकर ज़बरदस्ती दौड़ाना, बिना उनकी मरज़ी के बाल कटाना, उनके स्वाद छीनना....सब कुछ मन को कचोटता है। यहां तक, अपने बच्चों पर अपनी अभिलाषाएं/आकांक्षाएं ज़बरदस्ती थोपने की यह पुरानी भारतीय कहानी है।

चूंकि फ़िल्म सच्ची घटनाओं पर आधारित बताई गई है इसलिए निर्देशक और लेखक को इसके लिए दोष देना अतार्किक होगा, मगर फ़िल्म में कई चीज़ें हैं जो भारत में बच्चों के साथ ज़बरदस्ती की मां-बाप एंड कंपनी की पहले-से चली आ रही प्रवृति को देशभक्ति के नाम पर बढ़ावा देने में सहायक सिद्ध हो सकतीं हैं।

हां, स्त्रीमुक्ति की एकतरफ़ा दृष्टि से देखें तो फ़िल्म ज़ोरदार लगने लगती है। आवश्यक तो नहीं मगर यह संभावना ज़रुर होती है कि जो लड़की शारीरिक रुप से मजबूत हो वह पुरुषों के बीच जाकर आसानी से नहीं डरेगी, उनके और दुनिया के बीच आसानी से रह पाएगी। आवश्यक इसलिए नहीं है क्योंकि दमदार, मजबूत मर्द भी रिश्वतखोरों और नाम/पैसेवालों की ग़लत हरक़तों के सामने आसानी से घुटने टेकते पाए जाते हैं। भीड़ के खि़लाफ़ जा सकने का आत्मविश्वास ना जुटा पाने के कारण ही अकसर लोग ग़ुलामी की ज़िंदगी जीने को मजबूर होते हैं। (मैं तो इसकी चिंता किए बिना लिखता हूं कि बाक़ी समीक्षक क्या लिख रहे हैं, फ़िल्म कितनी चल रही है, पहले दिनों की कमाई कितनी है ;-)। जिसको जो अच्छा लगे ज़रुर करना चाहिए, मगर यहां लड़कियों ने पहलवानी अपनी मर्ज़ी से नहीं चुनी।

मैंने सोचा था कि इस फ़िल्म के बारे में नहीं लिखूंगा, लोग समझेंगे कि यह किसी व्यक्ति-विशेष का कट्टर विरोधी है मगर इसका क्या करुं कि मैं लेखन के क्षेत्र में आया ही इसलिए कि मुझे ऐसा लगता था कि कुछ बातें ऐसी हैं जिनके बारे में कोई नहीं लिखता और मुझे यह काम करना चाहिए।

ठीक इसी वक़्त आजतक पर आमिर और उनकी टीम बैठी है और गीता और बबिता बेधड़क बातें कर रहीं हैं। टीवी स्टूडियो में हर आम आदमी इसी तरह कम्फ़र्टेबल हो सके तो मज़ा ही आ जाए। 

(संभवत आगे और भी)

-संजय ग्रोवर
26-12-2016